लखटकिया एक कार ने किया वार पर वार
सहन नहीं कार पाई उनको अपनी हीं सरकार
अपनी हीं सरकार सुनाया एक नया फरमान
लेना नेनो को तभी जब कर पाओ सम्मान
कहाँ उठाएं- कहाँ बिठाएँ- कहाँ चलायें सोचो
छोटा घर जो पास तुम्हारे पहले उसको बेचो
दिल्ली में रहना जो तुमको दिलको जरा बढाओ
घर के आगे सड़क घेर कर पार्किंग एक बनाओ
फ़िर तुम चाहे एक खरीदो या फ़िर लाओ सारे
वार झेल पाएंगे हम भी सुन लो जनता प्यारे
दिल्ली का दिल बहुत बड़ा है पहले कोष भरेंगे
चलने वाले चलें बाला से या फ़िर कहीं मरेंगे
लाख टकिया की लाख कहानी आज यहीं पर छुट्टी
वरना सुनने वाले हीं अब कर जायेंगे छुट्टी
Tuesday, June 17, 2008
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