संसद से अब सड़क तक एक किस्म के लोग
नियति की यह करवट कैसी या ऐसा संयोग
या ऐसा संयोग महज है खेल कोई कुदरत का
धक्का मुक्की गाली देना फितरत जैसे सबका
घोटाला बेईमानी अब तो इनकी शान निराली
शोर मचाते ऐसे जैसे ऊपर मंजील खाली
कौन इन्हें समझाए यह सब बेमतलब का अनहद
सड़क सही हो जाए तब हीं सुधर सकेगा संसद
Monday, June 16, 2008
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