Monday, June 16, 2008

संसद से सड़क तक

संसद से अब सड़क तक एक किस्म के लोग
नियति की यह करवट कैसी या ऐसा संयोग
या ऐसा संयोग महज है खेल कोई कुदरत का
धक्का मुक्की गाली देना फितरत जैसे सबका
घोटाला बेईमानी अब तो इनकी शान निराली
शोर मचाते ऐसे जैसे ऊपर मंजील खाली
कौन इन्हें समझाए यह सब बेमतलब का अनहद
सड़क सही हो जाए तब हीं सुधर सकेगा संसद

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